Home Chhattisgarhरायगढ़ बस स्टैंड झेल रहा दुर्दशा की मार,भीख मांगने वाले और असमाजिक तत्वों का बना अड्डा

रायगढ़ बस स्टैंड झेल रहा दुर्दशा की मार,भीख मांगने वाले और असमाजिक तत्वों का बना अड्डा

by Niraj Tiwari

दो पहिया और चार पहिया वाहन के कारण बस स्टैंड में बसों का घुसना हुआ दुष्वार

रायगढ़।  जिला का बस स्टैंड छत्तीसगढ़ राज्य का अंतिम छोर में सबसे बड़ा बस स्टैंड है। जहां से पड़ोसी राज्य उड़ीसा और छत्तीसगढ़ जिले के लगभग सभी स्थानों के लिए सीधे बस का आवागमन होता है लेकिन इस बस स्टैंड की स्थिति ऐसी है कि ग्रामीण क्षेत्र के बस स्टैंड भी इसकी तुलना में लाखों गुना अच्छे हैं। जहां बसों के आवागमन के लिए पर्याप्त स्थान है। रायगढ़ बस स्टैंड में एक ही प्रवेश और निकास द्वार है जहां से बस भीतर घुसकर बाहर निकलती है। बावजूद इसके नगर निगम प्रशासन वहां अवैध रूप से संचालित दुकानों के खिलाफ में कोई कारवाई नहीं करता। सुबह से लेकर शाम तक दुकानों के सामने हजारों की संख्या में मोटरसाइकल व चार पहिया वाहन खड़े रहते हैं जिस कारण बसों के आवागमन में काफी परेशानी होती है।

    बस स्टैंड के विषय में बात करें तो वहां कचरे का अंबार लगा है। स्टैंड के भीतर तीन से चार दिनों में सफाई कर्मचारी पहुंचते हैं जहां चार दिनों में काफी कचरा भर जाता है और यात्रियों को काफी समस्या का सामना करना पड़ता है। शाम होते ही भीख मांगने वाले लोग बड़ी संख्या में बस स्टैंड के भीतर रैन बसेरा बनाकर सो जाते हैं। जिस कारण वहां यात्रियों को काफी दिक्कत होती है। आय दिन असमाजिक तपके के लोग यात्रियों से मारपीट हुआ लूटपाट की घटना को अंजाम देते हैं हालाकि वहां कोतवाली पुलिस द्वारा बस स्टैंड परिसर में पुलिस चौकी बनाई गई है लेकिन वहां पदस्थ आरक्षक अपनी वर्दी लटका कर स्वयं नदारत रहते हैं। जिस कारण हमेशा इस तरह की स्थिति बनी हुई है। 

आरक्षक वर्दी टांगकर हफ्ते में एक बार वसूली करने पहुंचते हैं बस स्टैण्ड 

कोतवाली थाना क्षेत्र में पड़ने वाले केवड़ा वाली बस स्टैंड से प्रतिदिन 100 बसों का आना जाना है। प्रत्येक बस से 20 रुपए बस स्टैंड स्थित चौकी के आरक्षक संतोष जयसवाल को जाता है। विडंबना यह है कि बस के स्टैंड में आने और जाने के दौरान होने वाली दिक्कत का सामना केवल एजेंटों को करना पड़ता है। बस स्टैंड नाम मात्र का रह गया है बस स्टैंड में लगने वाली दुकानों के सामने बड़ी संख्या में दोपहिया और चार पहिया वाहन खड़े रहते हैं। जिस कारण बसों के आने जाने में काफी तकलीफ होती है यदि कोई एजेंट बस लगाने के लिए किसी मोटरसाइकिल या चार पहिया वाहन चालक को कुछ बोलता है तो विवाद की स्थिति निर्मित हो जाती है। ऐसे में मामला सुलझाने के लिए थाना पुलिस की आवश्यकता होती है लेकिन जिम्मेदार जवाबदार बस स्टैंड की चौकी में पदस्थ कर्मचारी हमेशा नदारद रहते हैं। उन्होंने अपनी वर्दी को दीवार में इस तरह टांग दिया है जैसे कि उनकी वर्दी ही ड्यूटी कर रही हो। आरक्षक जायसवाल के बारे में पता करने पर मालूम पड़ा कि वह महीने में 1 दिन आते हैं और प्रत्येक बस के हिसाब से 20 रुपए जिसका हिसाब लगाया जाए तो प्रतिदिन 2,000 रुपए और महीने में 60,000 रुपया लेकर वह वापस घर चले जाते हैं। बस स्टैंड में हो रहे घटना दुर्घटना के मामले में नाही यात्री की कोई बात सुनी जाती है और ना ही एजेंटों की कोई सुनवाई है। यही स्थिति हमेशा इसी तरह बनी रहेगी तब क्या हुआ । कभी भी अपने सही स्थिति में नहीं आ पाएगा।

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